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धान, गेहूं, मक्का की नई तकनीक

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धान, गेहूँ और मक्का की नई खेती तकनीकें: बढ़ाएँ उपज 30% तक

नई कृषि तकनीकियों से धान, गेहूँ और मक्का की उपज बढ़ती है। उन्नत ड्रोन, स्मार्ट सिंचाई और जीन-सुधारित बीजों के उपयोग के साथ भारत में उत्पादन 30% तक बढ़ सकता है।

धान में सटीक सिंचाई, गेहूँ में अर्ली मैच्योर किस्में और मक्का में उच्च पोषक तत्व युक्त बीज—इन सब से किसान 30% अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं। आइए जानें नई तकनीकियों के कदम-दर-कदम विवरण।

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धान, गेहूँ और मक्का की नई खेती तकनीकें

भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिये धान, गेहूँ और मक्का की खेती में कई नई तकनीकें अपनाई जा रही हैं। ये तकनीकें उपज में 20‑30 % तक सुधार करती हैं और किसानों की आय में संतुष्टि लाती हैं।

1. धान: सटीक सिंचाई और उच्च‑उत्पादन वाली किस्में

धान की खेती में अब स्मार्ट सिंचाई प्रणाली का प्रयोग हो रहा है। यह प्रणाली सेंसर और मौसम डेटा के आधार पर पानी का स्तर नियंत्रित करती है। परिणामस्वरूप प्रति हेक्टेयर 10‑15 लीटर पानी ही पर्याप्त रहता है।

इसके साथ ही वोल्टैइस और पाथर जैसे पहले से ही जीन‑सुधारित किस्में प्रयोग में लाए जा रहे हैं। इनकी उगने की अवधि 90‑100 दिन है, जबकि पारंपरिक किस्मों का 120‑130 दिन। इससे फसल चक्र छोटा होता है और दूसरी फसल के लिये भूमि उपलब्ध रहती है।

2. गेहूँ: अर्ली मैच्योर और रजिस्टरड टमाटर टॉफ़

गीहूँ की नई तकनीक में अर्ली मैच्योर किस्में और सिंचाई-समर्थित ड्रिप सिस्टम प्रमुख हैं। उदाहरण के लिये ‘रिजिस्टर्ड-आइडिल’ (RI) किस्म 70 दिन में परिपक्व हो जाती है, जबकि सीढ़ियों की पारम्परिक किस्म 110‑120 दिन लगाती है। यह 30 % तक उपज में वाधा करता है।

ड्रिप सिंचाई से प्रति हेक्टेयर 4000 लीटर पानी ही पर्याप्त रहता है, जबकि पारम्परिक विस्फोटक (flood) से 8000‑12000 लीटर पानी लगते हैं। कृषि विभाग के आँकड़े बताते हैं कि जिन किसान ने ड्रिप सिस्टम अपनाया वे 25 % अधिक उत्पादन और 10 % कम पानी उपयोग करते हैं।

3. मक्का: उच्च पोषक तत्व और रोग‑प्रतिकारक किस्में

मक्का खेती में अब बायोटेक्नोलॉजी आधारित जीन‑सुधारित किस्में और सटीक पोषक योजनाएँ अपनाई जा रही हैं। ‘बीजीपी-शाक्तिक’ जैसी किस्मों में 10 % अधिक पोटेशियम और 5 % अधिक प्रोटीन पाया जाता है।

किसानों को ड्रोन‑जैव निगरानी से भी फायदा होता है। ड्रोन के द्वारा ली गई फसल प्रत्यक्ष छवियों से पनछी की पहचान 2 सप्ताह पहले हो जाती है, जिससे खेत में रोग नियंत्रित रखना आसान होता है। इन तकनीकों से फ़सल की उपज 28 % बढ़ गई है।

4. सामान्य तकनीकी सहायता और संसाधन

किसानों के लिए कृषि सूचना केंद्रों में प्रशिक्षण और भारतीय कृषि विभाग की वेबसाइट पर डिजिटल वन‑क्लिक योजनाएँ उपलब्ध हैं।

  • ड्रॉप‑डाउन मेनू से किस्म, क्षेत्र और पानी‑संचालन चुनें।
  • सॉफ्टवेयर द्वारा प्रदर्शित रिस्क रिपोर्ट से रोग व कीट प्रबंधन सुनिश्चित करें।
  • स्क्रीन पर दिखे हुए सिफ़ारिशों का पालन कर उपज बढ़ाएँ।

5. किस्म, निम्न लागत व लाभ

नई तकनीकों के प्रयोग के बाद किसान:

  • पानी के उपयोग में 25 % कमी।
  • उपज में 30 % तक वृद्धि।
  • बाज़ार मूल्य पर 12 % अतिरिक्त आय।
  • नींबू‑रूपे रेस्क्वेस्टेशन से फसल की गुणवत्ता बेहतर।

कानूनी एवं सरकारी सहायता

किसान कृषि विभाग के वार्षिक स्थायी खेती योजना (Kisan Satakha Pranali) के अंतर्गत फण्ड सहायता प्राप्त कर सकते हैं। आवश्यकता: 1.5 हेक्टेयर तक की भूमि, 1.00 ट्रैक्टर या ड्रोन; 3 मानक दस्तावेज शामिल हैं। आवेदन के लिये agri.gov.in पर जाएँ और प्रोग्राम चुनें।

निष्कर्ष: आज के किसान के लिये आवश्यक कदम

धान, गेहूँ और मक्का की नई तकनीकियाँ लागू करने के लिए किसान को चाहिए:

  1. किस्में चुनें: अर्ली मैच्योर, जीन‑सुधारित और पोषक‑समृद्ध किस्में।
  2. सटीक सिंचाई और ड्रोन निगरानी का इस्तेमाल करें।
  3. कृषि विभाग की वेबसाइट से फण्ड व सहायता योजनाओं के लिए आवेदन करें।
  4. प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लें।

इन सभी कदमों को अपनाने से उपज में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी और आय में सुधार संभव है।

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