पटना हाई कोर्ट का फैसला साफ है: ‘मौजूदा प्रतिबद्धता’ का मतलब केवल मौजूदा दायित्व ही हैं। And यह बात एक टेंडर प्रक्रिया में बतानी जरूरी है। यह फैसला एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें एक बिडर को टेक्निकल बिड स्टेज से अयोग्य ठहराने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति सुधीर सिंह और न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘मौजूदा प्रतिबद्धता’ का अर्थ केवल उन दायित्वों से है जो मौजूदा हैं और जिनका पालन किया जा सकता है। यह फैसला ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा एक ग्रामीण सड़क/पुल परियोजना के निर्माण और छह वर्षीय संचालन और रखरखाव के लिए एक टेंडर प्रक्रिया से संबंधित था, जिसमें 18.06.2024 को कार्यकारी अभियंता द्वारा काम छोड़ने का प्रस्ताव रखा गया था।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि बोली जमा करने की आखिरी तारीख से कोई काम करने की जरूरत नहीं थी। But अदालत ने कहा कि विभागीय अनुमोदन में औपचारिक देरी को याचिकाकर्ता के खिलाफ नहीं ठहराया जा सकता है। यह एक महत्वपूर्ण बात है।
अदालत का फैसला साफ है: कार्यकारी स्पष्टीकरण या प्रेस विज्ञप्ति शर्तों को बदल नहीं सकती। It’s that simple. अदालत ने याचिकाकर्ता को अयोग्य ठहराने के फैसले को अस्वीकार कर दिया और विभाग को पुनः विचार करने का निर्देश दिया, जो एक अच्छा निर्णय है।
